श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के द्वितीय दीक्षांत समारोह में 1497 विद्यार्थियों को मिलीं उपाधियां, संस्कृत को वैश्विक ज्ञान-विमर्श से जोड़ने का आह्वान

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026। भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कृत भाषा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय का संदेश देते हुए भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि संस्कृत भारत की भाषाई और सांस्कृतिक एकता को जोड़ने वाली स्वर्णिम डोर है। उन्होंने संस्कृत को केवल प्राचीन भाषा के रूप में देखने के बजाय इसे आधुनिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और वैश्विक ज्ञान-विमर्श से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
वे मंगलवार को नई दिल्ली स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के द्वितीय दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। समारोह में केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री श्री सुकान्त मजूमदार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों के कुल 1497 छात्र-छात्राओं को उपाधियां प्रदान की गईं। मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदकों से भी सम्मानित किया गया।
वैदिक मंत्रोच्चार, सरस्वती वंदना और मंगलाचरण के साथ आरंभ हुए इस समारोह में भारतीय संस्कृति, ज्ञान-परंपरा और विद्यार्थियों की उपलब्धियों का उत्सव देखने को मिला।

संस्कृत भारत की विविध भाषाओं को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा अपनी विशिष्ट पहचान, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के कारण महत्वपूर्ण है। संस्कृत भारतीय भाषाओं, दर्शन और ज्ञान-परंपराओं को एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना में जोड़ने का कार्य करती है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक डोर अनेक मोतियों को माला में पिरोती है, उसी प्रकार संस्कृत भारत की विविध भाषाओं और परंपराओं को एक सूत्र में जोड़ती है।
उपराष्ट्रपति ने दर्शन, साहित्य, गणित, विज्ञान, ज्योतिष, चिकित्सा और आध्यात्मिक चिंतन जैसे क्षेत्रों में संस्कृत में संचित ज्ञान को मानवता के लिए प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि इस ज्ञान-संपदा को आधुनिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय संवाद से जोड़ने की आवश्यकता है।
उन्होंने विश्वविद्यालय से संस्कृत अध्ययन को वैश्विक स्तर पर विस्तार देने और विभिन्न देशों के विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए अध्ययन एवं अनुसंधान के नए अवसर विकसित करने का आह्वान किया।
नैक ए++ ग्रेड मिलने पर विश्वविद्यालय को दी बधाई

उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय को नैक ए++ ग्रेड प्राप्त होने पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक और पूरे विश्वविद्यालय परिवार को बधाई दी। उन्होंने कहा कि संस्कृत विद्यापीठ से डीम्ड विश्वविद्यालय और फिर केंद्रीय विश्वविद्यालय तक संस्थान की यात्रा उसकी शैक्षणिक प्रतिबद्धता, निरंतर परिश्रम और सामूहिक संकल्प को दर्शाती है।उन्होंने विश्वविद्यालय से संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी पहचान को और मजबूत करने का आह्वान किया।
लाल बहादुर शास्त्री की परिकल्पना को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने का संदेश
उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री की दूरदर्शी सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी परिकल्पना थी कि दुनिया के विभिन्न देशों से लोग भारत आकर संस्कृत का अध्ययन करें।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में इस परिकल्पना को व्यापक वैश्विक स्वरूप देने की क्षमता है। इसके लिए संस्कृत शिक्षा, भारतीय ज्ञान प्रणाली, शोध और पांडुलिपि संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।
पांडुलिपियों का संरक्षण भविष्य की ज्ञान-संपदा के लिए जरूरी
उपराष्ट्रपति ने दुर्लभ और अप्रकाशित संस्कृत पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण, संपादन, वैज्ञानिक अध्ययन और प्रकाशन पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश-विदेश में सुरक्षित अनेक पांडुलिपियां मानव सभ्यता के लिए अमूल्य ज्ञान का स्रोत हैं।‘ज्ञान भारतम् मिशन’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पांडुलिपियों का संरक्षण केवल अतीत की विरासत को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए ज्ञान के नए द्वार खोलने का माध्यम भी है। उन्होंने शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों से इस दिशा में सक्रिय योगदान देने की अपील की।
संस्कृत और आधुनिक तकनीक के समन्वय से खुलेंगे नए अवसर : सुकान्त मजूमदार
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री श्री सुकान्त मजूमदार ने अपने संबोधन में कहा कि भारत अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा और आधुनिक प्रौद्योगिकी के समन्वय से विकास की नई संभावनाएं तलाश रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय भाषाओं और भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।उन्होंने कहा कि संस्कृत के विद्यार्थियों को पारंपरिक अध्ययन के साथ कंप्यूटर, आधुनिक भाषाविज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों का भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। संस्कृत और आधुनिक प्रौद्योगिकी का समन्वय भाषा-प्रौद्योगिकी तथा अनुसंधान के नए अवसर पैदा कर सकता है।
उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करने, आधुनिक ज्ञान और कौशल से स्वयं को सशक्त बनाने तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
ज्ञान, संस्कार और कौशल को राष्ट्रसेवा से जोड़ें विद्यार्थी : कुलपति
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने स्वागत उद्बोधन में उपराष्ट्रपति, केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री और सभी विशिष्ट अतिथियों का अभिनंदन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की विकास यात्रा, शैक्षणिक उपलब्धियों और भविष्य की प्राथमिकताओं पर प्रकाश डाला।
कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित कर रहा है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल संस्कृत के पारंपरिक अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान को समकालीन आवश्यकताओं से जोड़कर राष्ट्रीय और वैश्विक ज्ञान-विमर्श में प्रभावशाली स्थान दिलाना भी है।
उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक मूल्य तभी है, जब ज्ञान, जीवन-मूल्य, कौशल और प्रतिभा का उपयोग समाज तथा राष्ट्र के हित में किया जाए।

दीक्षांत समारोह नई जिम्मेदारियों की शुरुआत : उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि दीक्षांत समारोह शिक्षा की समाप्ति नहीं, बल्कि जीवन की नई यात्रा का शुभारंभ है। उन्होंने विद्यार्थियों को आजीवन सीखते रहने और बदलते समय के अनुरूप अपने ज्ञान एवं कौशल को विकसित करते रहने की सलाह दी।
उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य, अनुशासन और सकारात्मक दृष्टिकोण सफलता की राह प्रशस्त करते हैं। माता-पिता के त्याग और आचार्यों के मार्गदर्शन को अमूल्य बताते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
उन्होंने युवाओं से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने, अपनी मातृभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान करने और भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को समझने की अपील की। साथ ही उन्होंने नशीले पदार्थों से दूर रहने, स्वस्थ एवं अनुशासित जीवन अपनाने, खेल और रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ने तथा सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग करने की सलाह दी।
तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों का विमोचन
समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने विश्वविद्यालय के तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों ‘शोध प्रभा’, ‘आम्नाय कल्पतरु’ और ‘विद्यामृतम् ग्रंथ’ का विमोचन किया। इन प्रकाशनों को विश्वविद्यालय की शोधपरक और अकादमिक गतिविधियों की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया।
1497 विद्यार्थियों को मिलीं उपाधियां, मेधावियों को मिला सम्मान
द्वितीय दीक्षांत समारोह में 1497 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं। मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया गया। उपाधियां प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के साथ उनके अभिभावकों में भी उत्साह और गर्व का माहौल रहा।1497 विद्यार्थियों को मिलीं उपाधियां, मेधावियों को मिला सम्मान
द्वितीय दीक्षांत समारोह में 1497 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं। मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया गया। उपाधियां प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के साथ उनके अभिभावकों में भी उत्साह और गर्व का माहौल रहा।
समारोह में विश्वविद्यालय कोर्ट और कार्यपरिषद के सदस्यों के अलावा कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा, वित्त अधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव, विभिन्न पीठों के प्रमुख, विभागाध्यक्ष, संकाय सदस्य, गैर-शैक्षणिक सदस्य, अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। विश्वविद्यालय का द्वितीय दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों को शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाने, जीवन-मूल्यों को अपनाने और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देने की प्रेरणा देकर संपन्न हुआ।
